इसरो द्वारा किए गए इस प्रयोग का मकसद था अंतरिक्ष में टिकाऊ कृषि पद्धतियों की खोज करना है ताकि लंबी अवधि के मिशनों में इसे इस्तेमाल किया जा सके। यानी लंबे अंतरिक्ष मिशनों में खेती के द्वारा अंतरिक्ष यात्रियों को खाने-पीने की सुविधाएं उपलब्ध करवाई जा सकें। CROPS को विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर द्वारा डेवलप किया गया था जिसके तहत लोबिया के 8 बीजों को नियंत्रित वातावरण में उगाया गया। इस दौरान वैसी ही परिस्थितियों की नकल की गई जिनका सामना अंतरिक्ष यात्री मिशनों में कर सकते हैं।
ISRO ने X पर एक टाइम लैप्स वीडियो शेयर किया। तीन दिन पहले भी बीजों के अंकुरित होने की जानकारी दी गई थी। रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रयोग के लिए लोबिया को इसलिए चुना गया क्योंकि यह तेजी से अंकुरित होता है। इसरो के लिए यह बड़ी सफलता है क्योंकि भविष्य में दूसरे ग्रहों पर खेती की संभावनाओं को इसके जरिए तलाशा जा सकता है।
अंतरिक्ष यान में जो वातावरण होता है वह बंद वातावरण होता है। ऐसे में लोबिया को बढ़ने के लिए नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम और सल्फर जैसे आवश्यक पोषक तत्वों की जरूरत होती है। ये माइक्रोग्रैविटी में पौधे के विकास में मदद करते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, माइक्रोग्रैविटीमें पौधे अपने विकास पैटर्न में बदलाव करते हैं। मसलन, तने और जड़ के विकास में यहां बदलाव हो सकता है। धरती के मुकाबले पौधे अंतरिक्ष में सभी दिशाओं में बढ़ सकते हैं।
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